मेरी सफलता का राज, मेरे भगवान मेरे माता-पिता : श्रीरतन शर्मा / 1600 करोड़ के नए प्रोजेक्ट में बनाया भगवान परशुराम को पार्टनर

Posted by Vinay N. Joshi on December 27th, 2009

Sriratan Sharma Adressing In Vipra Mahakumbh At Kolkata. {Bikaner News & Photo : ChhotiKashi.com}

Sriratan Sharma Adressing In Vipra Mahakumbh At Kolkata. {Bikaner News & Photo : ChhotiKashi.com}

[caption id="" align="alignleft" width="450" caption="Vipra Mahakumbh At Kolkata. {Bikaner News & Photo : ChhotiKashi.com}"]Vipra Mahakumbh At Kolkata. {Bikaner News & Photo : ChhotiKashi.com}[/caption]
कोलकाता, 27 दिसम्बर। मुझे भाषण देना नहीं आता, ना ही वक्ता हूं लेकिन ब्राह्मण घर में जन्म लेकर पूनीत जीवन पाया है। मैंने अपने गांव राजस्थान के दाऊसर (रतनगढ़-जिला चूरू) में पीढ़ी दर पीढ़ी काम अनुसार मंदिर में पूजा की। 100 बच्चों के नामकरण कर एक-एक रुपया प्राप्त किया। अधिक पढ़ा लिखा नहीं मगर 16 वर्ष की उम्र में जब कुछ समझ पड़ी तो कर गुजरने की ठानी, सपने लिए, मेहनतकश दिमाग से उन्हें पूरा करने की ठानी, मेरे उस जजबे को आज मेरे गांव, राजस्थान प्रदेश और लगभग विप्र समाज ने है जानी। 42 वर्षीय श्रीरतन शर्मा। माता-पिता के अनन्य अनुयायी, भगवान शिव के भक्त और ब्राह्मण बेरोजगारों के मसीहा और युवाओं के लिए प्रेरणादायक उत्कृष्ट पथ प्रदर्शक। विप्र महाकुंभ का समापन समारोह चल रहा था, कोलकाता का नजरुल मंच जिस शख्सियत को एक टक निगाह और दो टूक सटीक उद्बोधन को तल्लीनता से सुन रहा था वह था श्रीरतन शर्मा। भगवान परशुराम के 24 घण्टों में अपने साथ मिले चमत्कार को बतलाते हुए एकदत सधे हुए और ‘लाइव’ अन्दाज में श्रीरतन शर्मा ने एक छोटे से गांव से निकलकर पिता की हर बात मानकर सफलता और उच्चतम शिखर की चढ़ी अपनी उन सीढ़ियों को जब बताया तो अनेक आत्माएं उन्हें दुआएं दे रही थीं तो कहीं से वाह-वाह के स्वर निकल रहे थे तो कईयों के रौंगटे खडे हो रहे थे। दर्जनों विविध क्षेत्रों की फैक्ट्रियों के मालिक शर्मा के मुताबिक उन्हें गर्व है कि वे एक पण्डित के बच्चे हैं।
Report By Journalist Sanjay Joshi In Vipra Mahakumbh, Kolkata {Bikaner News & Photo : ChhotiKashi.com}

Report By Journalist Sanjay Joshi In Vipra Mahakumbh, Kolkata {Bikaner News & Photo : ChhotiKashi.com}

पाठ-पूजा से जीवन शुरु करने वाले श्रीरतन 15 फरवरी 1995 को मेहनत, लगन, ईमानदारी को अपने तन और मन में भरकर पिता के पास असम आ गए थे। गरीब और गरीबी से भलीभांति परिचित, उनकी जरुरतों से वाकिफ शर्मा ने आज 5 हजार से अधिक ब्राह्मणों को अपनी कम्पनियों में रोजगार दे रखा है, तथा आज तक अपनी सीख-समझाइश से उन्हें पोषित करते हुए कभी भी किसी ब्राह्मण को नौकरी से बेदखल नहीं किया। दान की महिमा, संयुक्त परिवार के लाभ और मां-बाप को भगवान के रुप में मानने की अपनी विस्तारित कथनावली में शर्मा ने कहा कि मेरी सफलता का राज यही कि मां-बाप ने जो बोला मैंने वही किया। मैंने एक तरफ पिताजी व दूसरी तरफ दुनिया को तौला। गलत धन का अर्जन नहीं करने की अपील के साथ शर्मा ने बताया कि व्यक्ति का शादी के बाद नजरिया और बच्चे होने के बाद सोच बदल जाती है। उन्होंने कहा कि दूसरों को देखकर जलना मूर्खता है लकीर मिटाने की बजाए उसी के समीप एक अन्य लंबी लाइन खींचे। लोग पानी में नाव चलाते हैं मैंने रेत पर नाव चलाई है। टफ समाज में आगे बढ़ना मुश्किल है पग-पग पर कांटे हैं लेकिन सफल, उत्कृष्ट सोच के साथ परिजनों के आशीर्वाद से हर संकल्प को कटिबध्द किया, मात्र प्रबल इच्छा शक्ति से। उन्होंने कहा कि ब्राह्मणों को अपने अहंकार को मिटाकर एकजुटता से एक साथ कदमताल करनी होगी, आगे बढ़ने वालों को और आगे बढ़ाना होगा। मैंने भी विजन बनाकर काम किया है, मैं अपनी कहानी इसलिए बयां कर रहा हूं शायद इसमें किसी न किसी पर जरुर प्रभाव पडेग़ा। बकौल शर्मा हम एक-दूसरे की टांग खींचते हैं और लोग हमारा मजा लेते हैं, आज के दिन कोलकाता में अपने बिजनेस सम्बन्धी डील का उल्लेख करते हुए उन्होंने भगवान परशुरामजी को पार्टनर बनाकर 1600 करोड़ के प्रोजेक्ट की शुरुआत की जानकारी दी जिसका लाभ विप्र समाज के लिए समर्पित होगा।

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