भक्ति और आराधना विश्वास के ही नाम है : डॉ वसंतविजयजी म.सा. 

भक्ति और आराधना विश्वास के ही नाम है : डॉ वसंतविजयजी म.सा. 

"जब तक अंतर्मन प्रसन्न नहीं होगा, बाह्य जगत में प्रभु कृपा नहीं मिल सकती.."

–कृष्णगिरी शक्ति पीठधाम में श्रीमद् देवीभागवत कथा एवं यज्ञ महोत्सव में आध्यात्म योगीजी बोले ; दशा बदलें, दिशा स्वतः बदलेगी 

कृष्णगिरी। श्री पार्श्व पद्मावती शक्ति पीठ तीर्थधाम कृष्णगिरी में श्रीमद् देवी भागवत महापुराण एवं यज्ञ महोत्सव आराधना के 16वें दिन शनिवार को सातवां स्कंध पूर्ण हुआ। शक्तिपीठाधिपति, राष्ट्रसंत, परम् पूज्य गुरुदेव श्रीजी डॉ वसंतविजयजी महाराज साहेब ने इस दौरान कहा कि व्यक्ति के कान को पवित्र, मन को शुद्ध एवं जन्म को सार्थक करने वाली देवी भागवत कथा का सार जीवन की हर व्यथा को मिटाना है। भक्तानुग्रह अध्याय में भक्तों पर देवी के अनुग्रह की देवी मां भगवती की कृपा से इंद्र से राक्षसों द्वारा छीने गए राज सिंहासन प्राप्त होने का प्रसंग उन्होंने सुनाया। पूज्य गुरुदेवजी ने कहा की दशा बदलें, दिशा भी बदलेगी। आध्यात्म योगी संतश्रीजी ने देवी–देवताओं की पूजा भक्ति में पंचभूतों के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा पञ्चभूतों से तात्पर्य धूप, दीप, चंदन, पुष्प एवं निवेद्य से है। उन्होंने विस्तार पूर्वक बताया कि भक्ति में अज्ञानता दुख ही देती है। साधना के शिखर पुरुष डॉक्टर वसंत विजय जी महाराज साहेब ने कहा धूप देवी देवताओं को आमंत्रित करती है, दीप उनमें प्राणशक्ति डालता है, वहीं चंदन, पुष्प और नैवेद्य उन्हें प्रसन्न कर प्राणी मात्र के लिए सुख, वैभव, आरोग्य एवं ऐश्वर्य प्रदान करते हैं। भगवान भक्तों से इस क्रियाविधि के साथ-साथ मात्र विनय, विवेक पूर्वक समर्पित भाव से भक्ति चाहते हैं। श्री पद्मावती शक्तिपीठ धाम के पीठाधीश्वर, राष्ट्रसंत डॉ वसंतविजयजी म.सा. ने कहा कि किसी भी तीर्थधाम में प्रभुभक्ति के साथ साधक को जाप आराधना भी करनी चाहिए। आराधना का आधार लाभ व्यक्ति को लंबे समय तक मिलता है। यही नहीं गुरु निश्रा में धर्म की आराधना मेहनत के रूप में अर्थात कर्म की भांति ही होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि भक्ति और आराधना विश्वास के ही नाम है। व्यक्ति के पास दो प्रकार के मन होते हैं चेतन मन और अवचेतन मन। अपने अमृतमयी प्रवचन की ज्ञान वर्षा करते हुए राष्ट्रसंतश्रीजी ने कहा, माता पिता हो या गुरु उनके चरणों में समर्पित भाव से रहने पर दुनिया के किसी व्यक्ति के सामने झुकने की जरूरत नहीं पड़ती। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार बड़ा बनने के लिए संस्कार व शिष्टता जरूरी है, वैसे ही प्रभु एवं गुरुकृपा पाने के लिए मापदंड भी आवश्यक है। भक्ति के लिए क्षमता को आवश्यक बताते हुए यतिवर्यश्रीजी ने जीवन को संयमी बनाने की सीख दी। उन्होंने कहा कि समृद्धि, यश, कीर्ति, आरोग्य एवं सफलता पाने के लिए विकार मिटाने होंगे। माध्यम श्रेष्ठ होना चाहिए, माध्यम से आने वाला विजय पताका फहराता है। डॉ वसंतविजयजी म.सा.ने देवी भागवत श्रवण कर रहे युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि युवा मन चंचल होता है श्रेष्ठता के लिए गंभीरतापूर्वक मेहनत जरूरी है। उन्होंने कहा मधुर वाणी का उपयोग करें। अपशब्दों को त्यागने का संकल्प लें, क्योंकि अंतर्मन जब तक प्रसन्न नहीं होगा बाह्यजगत में ईश्वरीय कृपा नहीं मिल सकती। संतश्री ने सोच की महिमा-ताकत को भी मय उदाहरण के समझाया। शनिवार को हवन की लाभार्थी दुबई की श्रद्धालु भक्त सोनल पुत्री श्रीमती अनिला बहन महेश कपाड़िया परिवार वाले रहे। श्रीमती अनिला ने देवी भागवतजी की आरती की। कार्यक्रम का संचालन राजू सोनी, दीपक करनपुरिया व विनोद आचार्य ने किया। आयोजन का सीधा प्रसारण प्रतिदिन नियमित दोपहर दो बजे से शाम छः बजे तक थॉट योगा पर लाइव प्रसारित किया जा रहा है।

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